[ इस लेख का संपादित रूप दैनिक हिन्दुस्तान में 16 फरवरी को छपा था ]
सोपान जोशी
डीज़ल हमारे यहाँ पेट्रोल की तुलना मे चौथाई या तिहाई सस्ता बिकता है। पेट्रोल पर आबिकारी कर डीज़ल की तुलना मे सात गुणा रखती है सरकार। डीज़ल को सस्ता रखा जाता है किसानों के लिए, जिन्हे सिंचाई के लिए पंपसेट चलाने होते है और जमीन जोतने के लिए ट्रैक्टर। फिर हर तरह की रसद की ढुलाई ट्रकों से होती है, जो डीज़ल से ही चलते है। इस ईंधन की कीमत बिढ़ने से मँहगाई एकदम बिढ़ती है। इसिलए सरकार डीज़ल सस्ता रखती है।
किसानो को दी इस रियायत का मजा उठाते है डीजल गाड़ियां चलाने वाले। चूँकि डीज़ल पेट्रोल की तुलना मे गाढ़ा भी होता है तो थोड़ा ज्यादा चलता है। डीज़ल की गाड़ी चलाना पेट्रोल की तुलना मे कहीं सस्ता पड़ता है। इसीलिए हमारे यहाँ लगभग सारी टैक्सियां डीज़ल पर चलती है। गाड़ी बनाने वाली कई कंपनिया केवल डीज़ल की ही गाड़ियां बनाती है।
पिछले कुछ सालों मे बड़ी और आलीशान गाड़ियां भी डीज़ल की ही बिकने लगी हैं। ये विलासिता के वाहन चलाने मे सस्ते पड़ते हैं क्योंकि ये तो किसानो के लिए सस्ते रखे ईंधन पर चलते है। मँहगी गाड़ियों मे पेट्रोल की जगह डलने वाले हर एक लीटर डीज़ल से सरकार को सात गुणा नुकसान होता है। और यह घाटा सरकार गरीब किसानों के लिए नहीं, अमीरों की विलासिता के एवज उठाती है।
कई साल से बहस चल रही है कि इस अन्याय को कैसे रोका जाए। सरकार की मुश्किल यह है कि अगर डीज़ल पी जाने वाले इन अमीरों के लिए डीज़ल के दाम बढ़ाए तो उसकी गाज किसानों और ट्रक वालों पर भी गिरेगी। इसीलिए इतने साल से डीज़ल की इस आफत को सरकार ने जस का तस छोड़ रखा है।
लेकिन दो साल पहले योजना आयोग के श्री किरीट पारिख ने एक सुझाव रखा था। उन्होने कहा कि डीज़ल की कारों पर 81,000 रुपए का अतिरिक्त आबिकारी कर खरीद के समय ही लगा देना चाहिए। संसद का बजट सत्र आ चुका है। इस बार पेट्रोलियम मंतालय ने श्री पारिख का सुझाव आगे बढ़ा दिया है। अब सरकार को तय करना होगा कि उसकी मंशा क्या है। आसान नहीं होगा यह। कार बनाने वाली कई कंपनियों के मुनाफे डीज़ल गाड़ियों की बिक्री पर निर्भर है, और ये कंपिनयां बहुत ताकतवर है। ये साम-दाम-दंड-भेद, हर एक उपाय ढूँढेगी इस
अतिरिक्त कर को रोकने के लिए। क्योंकि अगर यह कर आ गया तो डीज़ल गाड़ियो की बिक्री बहुत कम हो जाएगी।
हाल ही मे कार कंपिनयो ने एक ‘वैज्ञानिक’ सवे के मार्फत ये ही बतलाना चाहा है कि कारों मे डीज़ल की खपत बहुत ही कम है। सर्वे की आलोचना भी हुई और कुछ जानकारों ने तो उसे फरेब ही बताया। कंपनियों ने पहले ही कह दिया है कि कारें भारी उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत आती हैं। इसलिए उनपर कर लगाने का अधिकार पेट्रोलियम मंत्रालय को है ही नहीं। उनका ये भी कहना है कि डीज़ल से चलने वाले बिजली जनरेटर भी विलास के साधन हैं। तो फिर उनकी बिक्री पर भी अतिरिक्त कर क्यों नहीं हो?
अब तो खुद योजना आयोग के श्री पारिख अपने सुझाव से पीछे हट गए है। किस दबाव में ये कहना मुश्किल है। कारें हमारे यहाँ नई समृद्धि का प्रतीक बन चुकीं है और आर्थिक विकास की तोता रटंत मे लगा हमारे समाज का ताकतवर वर्ग कारों की रफ्तार मे ही अपनी ‘सद्गति’ देखता है।
अब वित्त मंत्रालय को तय करना है कि वह इस समृद्धि के एवज में कितना धाटा उठाने को तैयार है। इस प्रकरण में हम सबके लिए कई सबक हैं। एक तो यह कि एक झूठ को छुपाने के लिए कई झूठ बोलने पड़ते हैं। यह सब जानते हैं कि हमारे यहाँ के साधारण किसान पंपसेट और ट्रेक्टर इस्तेमाल नहीं करते। ज्यादा करके ये सुविधाएं अमीर किसानों के पास ही होतीं है। देश के भूजल का जिस तेजी से विनाश हो रहा है, उसमे डीज़ल पंपसेट का योगदान अमूल्य रहा है। पर इससे एक तेज गति की अमीरी कुछ किसानों में दिखती है, जिसे हर सरकार ग्रामीण विकास की पराकाष्ठा मानती है।
अगर सरकार गरीबी किसानों का सोचती तो उसे उन जलस्रोतों के बारे में सोचना पड़ता, जिन्हे सरकार की भागीदारी से बर्बाद किया गया है। उन बैलों के बारे में सोचना पड़ता जो हजारों पीढ़ियों से हमारी जमीन जोतते आ रहे है, और शायद पेट्रोलियम के भंडार खतम होने पर वापिस याद किए जाएं। ये बैल की वो नायाब नस्लें है, जो कई सौ साल की साधना से तैयार की गयी थी और जिन्हें सरकार के ‘अनुवंश सुधार कार्यक्रमों’ ने छितरा दिया है। पर यह सब करना हो तो सरकार को अपने लोगों से उनकी भाषा मे बात करनी पड़ेगी।
पर डीज़ल गाड़ियों को रोकने का एक और बहुत बड़ा कारण है। चाहे वह पेट्रोल हो या प्राकृतिक गैस, हर ईंधन के घुंए से प्रदूषण होता है। पर केवल डीज़ल के घुंए में ही ऐसे सूक्ष्म कण होते हैं, जिनसे कैसर होता है। और इन कणों का स्वभाव भी विचित्र है। ट्रकों से निकलने वाले काले घुंए मे जो कण होते है, उन्हें हमारा शरीर श्वास नली के ऊपर ही रोक लेता है। लेकिन डीज़ल की आधुनिक गाड़ियो से जो अदृश्य घुंआ निकलता है, उसमे कैसर करने वाले कण बहुत ही छोटे होते हैं। ये सीधे हमारे फेफड़े तक जाते हैं।
इसीलिए उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली की सड़को पर सार्वजनिक परिवहन से डीज़ल हटवा दिया था। आज ये डीज़ल और इसके कैसर से लैस कण हमारी छाती में बहुत मँहगी और आलीशान गाड़ियों के सौजन्य से जा रहे है।
कुछ धुंआ तो हमारी अकल पर भी पड़ा है।
Categories: Automobiles, Environment, Public Health
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